भारत चीन सम्बन्धः समकालीन परिप्रेक्ष्य में
Abstract
भारत पहला ऐसा गैर समाजवादी देश था जिसने 01 अप्रैल, 1950 को चीन जनवादी गणराज्य के साथ राजनीतिक सम्बन्ध स्थापित किये, उस समय नेहरु जी प्रधानमंत्री थे और उन्होंने 1954 में चीन का दौरा किया। भारत ने हमेशा चीन पर भरोसा दिखाया पर चीन कभी भी उस विश्वास पर खरा नहीं उतरा, 1954 में नेहरु चीन की यात्रा करते हैं बदले में चाइना 1962 युद्ध जैसे संघर्ष की स्थिति पैदा कर भारत के विश्वास पर गहरा अघात करता है। इसके बाद भी भारत चाइना सहित अपने सभी पड़ोसी देशों के साथ एक विनम्र सम्बन्ध स्थापित करने का प्रयास करता है। चाइना के अघात को भूलते हुए 1988 में तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री राजीव गांधी ने द्विपक्षीय सम्बन्धों में सुधार का प्रयास किया इसी तरह 1993 में प्रधानमंत्री श्री नरसिम्हा राव ने चीन की मात्रा कर वास्तविक नियंत्रण रेखा पर अमन चैन के लिए करार पर हस्ताक्षर किया यह और बात है कि आज तक वास्तविक नियंत्रण रेखा पर अमन चैन स्थिरता जैसा कुछ वास्तविक प्रतीक नहीं होता देखा जैसे तो दोनों के प्रमुखों ने एक दूसरे देशों की यात्रा करके यह जरूर प्रयास किया कि दोनों देशों से सम्बन्ध सुधरे पर वास्तविक दौर पर सम्बन्ध सुधार वैसे ही रहा जैसे 1954 में नेहरु जी ने चीन की यात्रा कि बदले ने चीन ने 1962 का युद्ध भारत को उपहार में दिया पर समय बदल चुका है भारत की स्थिति किसी भी पहलू पर कैसी है ये तो चाइना अच्छी तरह जानता है लेकिन उसके बाद भी चीन ऐतिहासिक गलतियों को दोहराता है, चाइना जहाँ अपनी ऐतिहासिक गलतियाँ बार-बार करता है भारत वही अपनी-अपनी अच्छाई की नीतियाँ उसके साथ बार-बार दोहराता है। यदि दोनों देशों के राष्ट्र प्रमुखों की यात्रा को ध्यान दिया जाऐ, तो प्रधानमंत्री के तौर पर वाजपेयी जी 2003 में चीन की यात्रा करते हैं, प्रधानमंत्री वे जियाबाओ 2005 और 2010 में भारत की यात्रा करते है, राष्ट्रपति हूू जिंताओं 2006 भारत की यात्रा की, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह 2008 और 2013 में चीन की यात्रा की, प्रधानमंत्री ली किक्यांग ने 2013 में भारत की यात्रा की, राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने 2014 में भारत की यात्रा की अब यहाँ देखने वाली बात है कि केवल ये सभी यात्रायें चाइना की तरफ से औपचारिक हो रही क्योंकि कि चाइना की भूमिका नियंत्रण रेखा पर आज भी वैसे ही है जैसे 1962 में था। यह भारत की अपनी शान्ति प्रियता की नीति है कि वह किसी भी बड़े संघर्ष को अपने धैर्य के चलते नाकाम कर देता है। वरना नियंत्रण रेखा पर चाइना जैसी गतिविधि को अंजाम देता है अगर भारत अपनी धैर्यता का परिचय नहीं देता वो जरूर चाइना की नकारात्मक भूमिका सीमा पर किसी बड़े संघर्ष का रूप ले लेती है।
मुख्य शब्द: शान्ति प्रियता की नीति, औपचारिक वार्ता नियंत्रण रेखा पर संघर्ष की स्थिति, भारत का सहयोगात्मक रवैया।
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