वैश्विक दक्षिण एशिया के प्रति भारतीय विदेश नीति (प्रधानमन्त्री पी0वी0 नरसिंहराव के प्रधानमन्त्रित्व काल में)

Authors

  • 1डा0 दीपक सिंह

Abstract

स्वतन्त्रता के बाद प्रधानमन्त्री जवाहरलाल नेहरू के समय में भारत की विदेश नीति स्वतन्त्र दृश्टिकोण और गुटनिरपेक्षता की रही है, विश्व शान्ति को बनाए रखना, युद्ध की सम्भावनाओं को टालना, विवादों का मध्यस्थता या पंच-निर्णय द्वारा निपटारा करना, जातिभेद, रंगभेद और साम्राज्यवाद का विरोध करना तथा राष्ट्रीय हितों की रक्षा करना विदेष नीति के लक्ष्य रहे हैं। नेहरू ने किसी तरह के क्षेत्रीय संगठनों के निर्माण तथा विस्तार करने में रूचि नहीं ली विश्व के दो गुटों में बंट जाने से भारत ने किसी भी गुट के साथ रहने में रूचि नहीं ली तथा दोनों से (अमेरिका, सोवियत संघ) समान दूरी बनाए रखा तथा गुटों से अलग गुट निरपेक्षता की नीति को बनाए रखा। प्रधानमन्त्री लाल बहादुर शास्त्री ने भी नेहरू की विदेश नीति का पालन करते हुए किसी प्रकार के क्षेत्रीय संगठन का समर्थन नहीं किया किन्तु प्रधानमन्त्री इन्दिरा गांधी के कार्यकाल (1971) में भारत-सोवियत मैत्रीसन्धि की गई तथा इसके बाद क्षेत्रीय संगठनों की महत्वा को स्वीकार किया जाने लगा तथा इसी क्रम में सार्क जैसे संगठनों की स्थापना हुई, यह दक्षिण एशिया के सात पड़ोसी देशों की विश्व राजनीति में क्षेत्रीय सहयोग की पहली शुरूआत थी।
मुख्य शब्दावली- वैश्विक दक्षिण एशिया, भारतीय विदेश नीति, प्रधानमन्त्री पी0वी0 नरसिंहराव प्रधानमन्त्रित्व काल, विश्व राजनीति, क्षेत्रीय सहयोग।

 

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Published

31-01-2022

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1.
1डा0 दीपक सिंह. वैश्विक दक्षिण एशिया के प्रति भारतीय विदेश नीति (प्रधानमन्त्री पी0वी0 नरसिंहराव के प्रधानमन्त्रित्व काल में). IJARMS [Internet]. 2022 Jan. 31 [cited 2026 Apr. 4];5(1):29-32. Available from: https://journal.ijarms.org/index.php/ijarms/article/view/205

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Articles