लैंगिक संवेदनशीलता और शिक्षक
Abstract
किसी भी समाज या राष्ट्र का विकास मुख्य रूप से उसके प्राकृतिक संसाधनों एवं मानव संसाधनों पर निर्भर करता है। शिक्षा मानव संसाधन के निर्माण का साधन है। शिक्षा का सीधा सम्बन्ध मनुष्य के मनोजगत से है। मानसिक उत्थान द्वारा व्यक्ति में विवेक बुद्धि का विकास शिक्षा का मूलभूत प्रयोजन है। यही विवेक उसे भले-बुरे का करणीय-अकरणीय उचित-अनुचित का ज्ञान करा देता है। इस विवेक जागरण में शिक्षा से बढ़कर अन्य किसी साधन की भूमिका श्रेयष्कर नहीं हो सकती। मनोवैज्ञानिक दृष्टि से लड़के-लड़कियों में कोई अन्तर नहीं होता। लोकतन्त्र लिंग के आधार पर किसी भी क्षेत्र में भेदभाव नहीं करता। परन्तु लैंगिक सम्बन्धी असमानता कई रूपां में उभरकर आती है। सामाजिक रूढ़िवादी सोच, घरेलू तथा समाज के स्तर पर हिंसा और महिलाआें के साथ दोयम दर्जे का व्यवहार इसके कुछ उदाहरण हैं। लोकतान्त्रिक समाज के निर्माण एवं विकास के लिए इन विभेदों को दूर किया जाना आवश्यक है। जेण्डर का मुद्दा पूरी मानवता का मुद्दा है। बचपन से ही बच्चों में जेण्डर के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित किया जाये तो स्वस्थ मानसिकता लेकर ही बच्चे विकसित होंगे। इसलिए विद्यालयी शिक्षा का स्थान महत्वपूर्ण हो जाता है। शिक्षक का दायित्व बच्चों को केवल विषय का ज्ञान देकर ही पूर्ण नहीं हो पाता है। जेण्डर के मुद्दे के प्रति संवेदनशीलता का विकास विद्यालय में अनेकों गतिविधियों के माध्यम से किया जा सकता है। पाठ्यपुस्तकों में जेण्डर संवेदीकरण सम्बन्धित पाठ, पाठ्यक्रम में बदलाव, शिक्षकों द्वारा समानता का व्यवहार आदि से स्वस्थ मानसिकता लेकर बच्चों का विकास होगा।
प्रमुख शब्दावली - लैंगिक, संवेदनशीलता, शिक्षा, शिक्षक
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