समकालीन हिन्दी कविता में किसान जीवन डॅा0 सुमति सिंह1
Abstract
समकालीन हिन्दी कविता में किसान जीवन का चित्रण भारतीय ग्रामीण समाज की वास्तविकताओं, संघर्षों और विडंबनाओं को अभिव्यक्त करता है। वर्तमान समय में वैश्वीकरण, बाजारवाद, जलवायु परिवर्तन तथा कृषि संकट के प्रभावों ने किसान के जीवन को अत्यंत जटिल बना दिया है। कवियों ने अपनी संवेदनशील दृष्टि से किसान की आर्थिक विषमता, ऋणग्रस्तता, आत्महत्या, विस्थापन और श्रम की अवमूल्यता को गहराई से उकेरा है। समकालीन कविता में किसान केवल अन्नदाता के रूप में नहीं, बल्कि एक पीड़ित, संघर्षशील और उपेक्षित वर्ग के प्रतिनिधि के रूप में उभरता है। इसमें प्रकृति के साथ उसके जीवंत संबंध, परंपरागत जीवन-मूल्य और बदलते सामाजिक-आर्थिक परिवेश का द्वंद्व भी परिलक्षित होता है। इस प्रकार, समकालीन हिन्दी कविता किसान जीवन के बहुआयामी यथार्थ को उद्घाटित करते हुए समाज को संवेदनशील बनाने का कार्य करती है।
कुंजी शब्द- किसान जीवन, समकालीन हिन्दी कविता, कृषि संकट, वैश्वीकरण, ग्रामीण समाज, आर्थिक विषमता, किसान आत्महत्या, सामाजिक यथार्थ
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