पंडिता क्षमाराव प्रणीत सत्याग्रहगीता महाकाव्य के संदर्भ में लोक संस्कृति एवं राष्ट्रीय एकता

Authors

  • किरंता बाई मीना

Abstract

इस शोध का उ‌द्देश्य आधुनिक समय में लोक संस्कृति एवं राष्ट्रीय एकता को संरक्षण प्रदान करना एवं वर्तमान समय में हमारी जो संस्कृति शनैः शनै धूमिल होती जा रही है उसके प्रति जनमानस को सजग करना है। यह शोध पत्र इस बात पर चर्चा करने की कोशिश करता है कि किसी देश की शिक्षा प्रणाली अपने देशवासियों में राष्ट्रवाद कैसे पैदा कर सकती है साथ ही लोक संस्कृति को किस प्रकार से और अधिक प्रसिद्धि एवं संरक्षण प्रदान कर सकती है। लोक शब्द का अर्थ बहुत व्यापक है। लोक एक ऐसी अवधारणा है जिसकी कुछ निजी परंपराएं होती हैं। संस्कृति सामाजिक परंपरा से प्राप्त चिंतन अनुभव और व्यवहार की समस्त रीतियों का समावेश लोक में दिखाई देता है। लोक संस्कृति मानव के विविध क्रिया कलापों, परंपराओं, रीति-रिवाजों, विचारों, आस्था , विश्वासों और संस्कारो आदि की सामूहिक अभिव्यक्ति है। लोक संस्कृति के अन्तर्गत जनजीवन से सम्बंधित सभी आचार विचार, रहन-सहन, विधि-निषेध, प्रथा परम्परा, धर्म कर्म, पूजा पाठ) खान-पान) वेशभूषा और यज- अनुष्ठान आदि आते है। जबकि राष्ट्रीय एकता का अर्थ राष्ट्र की विभिन्न इकाइ‌यों के एक साथ मिल-जुलकर सौहार्दपूर्ण ढंग से राष्ट्र‌हित में कार्य करना है। साम्प्रदायिकता, जातीयता, क्षेत्रीयता, धार्मिकता या भाषायी उन्मादो से अलग हटकर राष्ट्रीय दृष्टिकोण से कार्य करना ही राष्ट्रीय एकता है। राष्ट्रीय एकता मोतियों के समान है जो विभिन्न मानको को एक साथ बांधकर रखती है।

बीज शब्द- लोक संस्कृति, साम्प्रदायिकता, जातीयता, क्षेत्रीयता, राष्ट्रीय एकता

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Published

01-05-2025

How to Cite

1.
किरंता बाई मीना. पंडिता क्षमाराव प्रणीत सत्याग्रहगीता महाकाव्य के संदर्भ में लोक संस्कृति एवं राष्ट्रीय एकता. IJARMS [Internet]. 2025 May 1 [cited 2026 May 18];8:34-7. Available from: https://journal.ijarms.org/index.php/ijarms/article/view/914