राजनीतिक दलों में आंतरिक लोकतंत्र
https://doi.org/10.5281/zenodo.20437753
Abstract
लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था में राजनीतिक दलों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है। राजनीतिक दल न केवल शासन निर्माण की प्रक्रिया में भाग लेते हैं, बल्कि वे जनता और सरकार के मध्य सेतु का कार्य भी करते हैं। किसी भी लोकतंत्र की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि राजनीतिक दल स्वयं कितने लोकतांत्रिक हैं। यदि राजनीतिक दलों के भीतर निर्णय लेने की प्रक्रिया केंद्रीकृत हो, नेतृत्व वंशवाद पर आधारित हो, उम्मीदवार चयन में पारदर्शिता का अभाव हो तथा कार्यकर्ताओं की सहभागिता सीमित हो, तो लोकतंत्र की वास्तविक भावना कमजोर पड़ जाती है। आंतरिक लोकतंत्र का अर्थ राजनीतिक दलों के भीतर समान भागीदारी, नेतृत्व का लोकतांत्रिक चयन, वित्तीय पारदर्शिता, विचार-विमर्श की स्वतंत्रता तथा संगठनात्मक जवाबदेही से है। भारत सहित अनेक लोकतांत्रिक देशों में राजनीतिक दलों में आंतरिक लोकतंत्र की स्थिति एक गंभीर विमर्श का विषय बनी हुई है। इस शोध पत्र में राजनीतिक दलों में आंतरिक लोकतंत्र की अवधारणा, उसकी आवश्यकता, महत्व, भारतीय राजनीतिक दलों की संरचना, दलों के भीतर लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं की वर्तमान स्थिति, वंशवाद, व्यक्तिवाद, धनबल एवं बाहुबल का प्रभाव, चुनाव आयोग की भूमिका तथा सुधार संबंधी उपायों का विस्तृत विश्लेषण किया गया है। अध्ययन में यह स्पष्ट किया गया है कि भारतीय लोकतंत्र की गुणवत्ता तभी सुदृढ़ हो सकती है जब राजनीतिक दलों के भीतर पारदर्शी एवं सहभागी संरचना विकसित की जाए। शोध में तुलनात्मक दृष्टिकोण अपनाते हुए अमेरिका, ब्रिटेन तथा जर्मनी जैसे देशों की राजनीतिक दल व्यवस्था का भी संक्षिप्त अध्ययन किया गया है। अंततः शोध पत्र में यह निष्कर्ष प्रस्तुत किया गया है कि आंतरिक लोकतंत्र राजनीतिक स्थिरता, सुशासन तथा जनविश्वास की आधारशिला है।
प्रमुख शब्द- राजनीतिक दल, आंतरिक लोकतंत्र, नेतृत्व चयन, संगठनात्मक पारदर्शिता, भारतीय लोकतंत्र, वंशवाद, चुनाव सुधार, राजनीतिक सहभागिता
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