संस्कृति चिंतन और हिंदी साहित्य

Authors

  • डॉ. (श्रीमती) सरोज गोस्वामी

Abstract

संस्कृति किसी भी समाज की पहचान, जीवन-दृष्टि, परंपराओं, मूल्यों, आस्थाओं तथा सामाजिक व्यवहार का समग्र रूप है। हिंदी साहित्य भारतीय संस्कृति का सशक्त संवाहक एवं संवर्धक रहा है। आदिकाल से लेकर समकालीन साहित्य तक हिंदी साहित्य में सांस्कृतिक चेतना, लोकजीवन, नैतिक मूल्यों, सामाजिक समरसता, धार्मिक सहिष्णुता, राष्ट्रीय भावना तथा मानवीय संवेदनाओं का व्यापक चित्रण मिलता है। प्रस्तुत शोध का उद्देश्य हिंदी साहित्य में निहित संस्कृति-चिंतन के विविध आयामों का विश्लेषण करना है। इस अध्ययन में यह स्पष्ट किया गया है कि हिंदी साहित्य केवल समाज का दर्पण नहीं है, बल्कि सांस्कृतिक संरक्षण, सामाजिक परिवर्तन तथा राष्ट्रीय एकता का प्रभावी माध्यम भी है। भक्ति साहित्य ने आध्यात्मिक एवं मानवीय मूल्यों को प्रतिष्ठित किया, जबकि आधुनिक हिंदी साहित्य ने सामाजिक सुधार, लोकतांत्रिक चेतना, स्त्री विमर्श, दलित विमर्श, पर्यावरणीय चेतना तथा वैश्वीकरण के संदर्भ में संस्कृति के बदलते स्वरूप को अभिव्यक्त किया। शोध में वर्णनात्मक एवं विश्लेषणात्मक पद्धति का उपयोग करते हुए यह निष्कर्ष निकाला गया है कि हिंदी साहित्य भारतीय संस्कृति की निरंतरता, विविधता एवं जीवंतता का प्रामाणिक दस्तावेज है। वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में सांस्कृतिक अस्मिता, भारतीय ज्ञान परंपरा तथा मानवीय मूल्यों के संरक्षण के लिए हिंदी साहित्य का अध्ययन अत्यंत प्रासंगिक एवं आवश्यक है।
मुख्य शब्द- हिंदी साहित्य, संस्कृति चिंतन, भारतीय संस्कृति, सांस्कृतिक चेतना, लोक संस्कृति, भारतीय ज्ञान परंपरा, सामाजिक मूल्य, सांस्कृतिक अस्मिता

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Published

31-01-2026

How to Cite

1.
डॉ. (श्रीमती) सरोज गोस्वामी. संस्कृति चिंतन और हिंदी साहित्य. IJARMS [Internet]. 2026 Jan. 31 [cited 2026 Jul. 7];9(01):241-6. Available from: https://journal.ijarms.org/index.php/ijarms/article/view/921

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