भारतीय राजनीतिक चिंतन में मानवाधिकार विमर्श
DOI- https://doi.org/10.5281/zenodo.21743363
Abstract
मानवाधिकार आधुनिक लोकतांत्रिक व्यवस्था का आधारभूत तत्व है। भारत में मानवाधिकार की अवधारणा केवल आधुनिक संविधान अथवा अंतरराष्ट्रीय घोषणाओं का परिणाम नहीं है, बल्कि इसकी जड़ें भारतीय राजनीतिक एवं दार्शनिक परंपरा में अत्यंत प्राचीन हैं। वैदिक साहित्य, उपनिषद, बौद्ध एवं जैन दर्शन, कौटिल्य के अर्थशास्त्र तथा आधुनिक भारतीय चिंतकों-महात्मा गांधी, डॉ. भीमराव आंबेडकर, स्वामी विवेकानन्द, पंडित जवाहरलाल नेहरू आदि के विचारों में मानव गरिमा, समानता, स्वतंत्रता, न्याय तथा सामाजिक उत्तरदायित्व की अवधारणाएँ स्पष्ट रूप से दिखाई देती हैं। प्रस्तुत शोध-पत्र का उद्देश्य भारतीय राजनीतिक चिंतन में मानवाधिकार की अवधारणा का विश्लेषण करना तथा यह स्पष्ट करना है कि भारतीय परंपरा में अधिकारों के साथ-साथ कर्तव्यों पर भी समान रूप से बल दिया गया है। अध्ययन वर्णनात्मक एवं विश्लेषणात्मक पद्धति पर आधारित है तथा द्वितीयक स्रोतों का उपयोग किया गया है।
प्रमुख शब्द- मानवाधिकार, भारतीय राजनीतिक चिंतन, संविधान, मौलिक अधिकार, लोकतंत्र, समानता, व्यक्ति की गरिमा
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