चौखम्भा राज्य से सहभागी लोकतंत्र तकः डॉ. राम मनोहर लोहिया के विकेंद्रीकरण चिंतन की समकालीन संवैधानिक प्रासंगिकता

DOI- https://doi.org/10.5281/zenodo.21966477

Authors

  • राम नारायण

Abstract

भारत में स्थानीय स्वशासन की संस्थाएँ कृ पंचायती राज संस्थाएँ कृ 73वें एवं 74वें संविधान संशोधन (1992) के माध्यम से संवैधानिक दर्जा तो प्राप्त कर चुकी हैं, किंतु निधि (निदके), कार्य और कार्मिक के त्रिविध अभाव के कारण उनकी वास्तविक स्वायत्तता आज भी सीमित बनी हुई है। यह शोध-पत्र इस संस्थागत यथार्थ को डॉ. राम मनोहर लोहिया के ”चौखम्भा राज्य“ के मानक-आदर्श के विरुद्ध रखकर परखता है, जिसमें उन्होंने गाँव, ज़िला, प्रांत और केंद्र कृ इन चार स्तंभों पर आधारित एक ऐसी सत्ता-संरचना की कल्पना की थी जो केवल प्रशासनिक विकेंद्रीकरण नहीं, बल्कि आर्थिक-राजनीतिक समता का साधन भी हो। शोधपत्र का तर्क त्रिस्तरीय सैद्धांतिक ढाँचे पर टिका हैः लोहिया का चौखम्भा एवं सप्तक्रांति चिंतन केंद्रीय मानक-कसौटी के रूप में; कैरोल पेटमैन एवं शेरी अर्नस्टीन का सहभागी-विमर्शमूलक लोकतंत्र सिद्धांत तुलनात्मक-वैश्विक संदर्भ प्रदान करने हेतु; और सहायकता का सिद्धांत संवैधानिक-संस्थागत विश्लेषण के औज़ार के रूप में। पद्धति की दृष्टि से यह पत्र गुणात्मक, व्याख्यात्मक एवं दस्तावेज़ी विश्लेषण पर आधारित है, जिसमें लोहिया की मूल कृतियों, संवैधानिक प्रावधानों, पंचायती राज मंत्रालय की विकेंद्रीकरण-सूचकांक रिपोर्टों तथा नीति आयोग के दस्तावेज़ों का सहपठन किया गया है। प्रारंभिक विश्लेषण यह संकेत करता है कि पंचायती राज संस्थाएँ लोहिया के आदर्श की औपचारिक छाया तो हैं, किंतु सत्ता के वास्तविक हस्तांतरण की दृष्टि से उनसे काफी दूर खड़ी हैं कृ और यही अंतराल लोहिया के चिंतन को आज भी प्रासंगिक बनाता है।
प्रमुख शब्द- चौखम्भा राज्य; सप्तक्रांति; सहभागी लोकतंत्र; सहायकता का सिद्धांत; पंचायती राज संस्थाएँ; विकेंद्रीकरण

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Published

31-07-2026

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1.
राम नारायण. चौखम्भा राज्य से सहभागी लोकतंत्र तकः डॉ. राम मनोहर लोहिया के विकेंद्रीकरण चिंतन की समकालीन संवैधानिक प्रासंगिकता: DOI- https://doi.org/10.5281/zenodo.21966477. IJARMS [Internet]. 2026 Jul. 31 [cited 2026 Aug. 16];9(02):54-69. Available from: https://journal.ijarms.org/index.php/ijarms/article/view/946

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