शारीरिक शिक्षा और सामाजिक समावेशन

Authors

  • डॉ0 राकेश कुमार तिवारी

Abstract

शारीरिक शिक्षा केवल शारीरिक दक्षता और स्वास्थ्य संवर्धन का माध्यम नहीं है, बल्कि यह समाज में समानता, सहभागिता और सामाजिक न्याय को सुदृढ़ करने का एक प्रभावी उपकरण भी है। समावेशी समाज की अवधारणा में प्रत्येक व्यक्तिकृचाहे वह लिंग, जाति, वर्ग, धर्म, दिव्यांगता या सामाजिक‑आर्थिक पृष्ठभूमि के आधार पर भिन्न क्यों न हो, को समान अवसर प्रदान करना निहित है। इस शोध पत्र का उद्देश्य शारीरिक शिक्षा की भूमिका का विश्लेषण करना है कि किस प्रकार यह सामाजिक समावेशन को प्रोत्साहित करती है। अध्ययन में शारीरिक शिक्षा के सैद्धांतिक आधार, ऐतिहासिक विकास, भारतीय परिप्रेक्ष्य, विद्यालयी एवं उच्च शिक्षा में इसकी भूमिका, दिव्यांग व्यक्तियों, महिलाओं, वंचित वर्गों और अल्पसंख्यकों के समावेशन में योगदान, चुनौतियाँ तथा नीतिगत उपायों का विस्तार से विवेचन किया गया है। यह शोध दर्शाता है कि यदि शारीरिक शिक्षा को समावेशी दृष्टिकोण से लागू किया जाए तो यह सामाजिक एकता, सहयोग, आत्मसम्मान और लोकतांत्रिक मूल्यों के विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
मुख्य शब्द- शारीरिक शिक्षा, सामाजिक समावेशन, समान अवसर, दिव्यांगता, लैंगिक समानता, सामाजिक न्याय

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Published

31-01-2025

How to Cite

1.
डॉ0 राकेश कुमार तिवारी. शारीरिक शिक्षा और सामाजिक समावेशन. IJARMS [Internet]. 2025 Jan. 31 [cited 2026 Mar. 3];8(01):178-89. Available from: https://journal.ijarms.org/index.php/ijarms/article/view/817

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