लोकमीतों में संवेदनात्मक अभिव्यक्ति एवं परिवर्तित स्वरूप का विवेचनात्मक अध्ययन
DOI- https://doi.org/10.5281/zenodo.21742999
Abstract
लोक गीतों में संवेदनाओं की अभिव्यक्ति समाहित होती है। अंग्रेजी के श्थ्वसाश् शब्द का हिन्दी अनुवाद ‘लोक’ कहलाता है। इसका वास्तविक अर्थ उस समाज से है, जिसमें सामूहिक विवेक और अनुभव का सामंजस्य है। आम जन के सुख-दुख में आत्मीय स्तर तक जुड़ना लोक संवेदना के रूप को प्रतिफलित करता है। संवेदना हमारी भाव-प्रवणता एवं बौद्धिक चेतना के मध्य एक सेतु का कार्य करती है। लोकगीत समाज में विभिन्न संस्कारों, उत्सवों (मुंडन, जनेऊ, भात, श्रमगीत, सावन-होली) पर गाये जाते हैं एवं सम्बन्धों की गहनता को अभिव्यक्ति प्रदान करते हैं। मालिनी अवस्थी, इला अरूण, तीजनबाई, शारदा सिन्हा इत्यादि अनेकानेक लोक-कलाकारों ने लोक-गीत परम्परा को समृद्ध किया है किन्तु वैश्वीकरण के दौर में एवं पाश्चात्य आधुनिक प्रभाव के कारण लोक-गीतों का अस्तित्व चुनौती का विषय है। यदि वर्तमान में इसके संरक्षण के प्रयास नहीं किये गये, तो वह दिन दूर नहीं जब लोक-गीत विलुप्त हो जायेंगे। यद्यपि सांस्कृतिक महोत्सव इस दिशा में सराहनीय भूमिका का निर्वहन करते हैं। पारम्परिक वाद्य यन्त्रों का प्रयोग भी कम होता जा रहा है। जिससे लोकगीत अपने मूल स्वरूप को खोते जा रहे हैं। डिजिटल प्लेटफॉर्म इस दिशा में महत्वपूर्ण कार्य करने का प्रयास कर रहे हैं। आज लोकगीतों का संरक्षण एवं इसकी संवेदनशीलता को बनाये रखना सामाजिक एवं सांस्कृतिक दायित्व भी है।
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