भारत में महँगाई और घरेलू उपभोगः खाद्य मुद्रास्फीति के आर्थिक प्रभाव का विश्लेषण

DOI- https://doi.org/10.5281/zenodo.22996545

Authors

  • डा0 मनोज कुमार अवस्थी

Abstract

भारत जैसे विकासशील एवं विशाल जनसंख्या वाले देश में महँगाई केवल व्यापक आर्थिक स्थिरता का प्रश्न नहीं है, बल्कि यह प्रत्यक्ष रूप से घरेलू कल्याण, खाद्य सुरक्षा, पोषण, वास्तविक आय, बचत, निवेश तथा जीवन-स्तर को प्रभावित करती है। विशेष रूप से खाद्य मुद्रास्फीति का प्रभाव सामान्य मुद्रास्फीति की तुलना में अधिक व्यापक और असमान होता है, क्योंकि निम्न एवं निम्न-मध्य आय वाले परिवार अपनी आय का अपेक्षाकृत बड़ा हिस्सा भोजन पर खर्च करते हैं। वर्ष 2020-2024 की अवधि भारत की अर्थव्यवस्था के लिए असाधारण रही। कोविड-19 महामारी, लॉकडाउन, आपूर्ति शृंखला में व्यवधान, श्रम एवं परिवहन संबंधी बाधाएँ, वैश्विक कमोडिटी कीमतों में वृद्धि, रूस-यूक्रेन युद्ध, ऊर्जा कीमतों की अस्थिरता, प्रतिकूल मानसून एवं जलवायु घटनाएँ तथा घरेलू कृषि आपूर्ति में उतार-चढ़ाव ने खाद्य कीमतों पर लगातार दबाव बनाया। प्रस्तुत शोध-पत्र का उद्देश्य 2020 से 2024 के बीच भारत में खाद्य मुद्रास्फीति और घरेलू उपभोग के संबंध का विश्लेषण करना है। अध्ययन में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक, उपभोक्ता खाद्य मूल्य सूचकांक, भारतीय रिजर्व बैंक की वार्षिक रिपोर्ट, आर्थिक सर्वेक्षण तथा घरेलू उपभोग व्यय सर्वेक्षण 2022-23 एवं 2023-24 के आँकड़ों का उपयोग किया गया है। सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय के अनुसार उपभोक्ता खाद्य मूल्य सूचकांक खाद्य वस्तुओं की खुदरा कीमतों में परिवर्तन को मापता है और उपभोक्ता मूल्य सूचकांक का उपयोग मुद्रास्फीति मापन, मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण तथा राष्ट्रीय आय के अपस्फीतिकारक के रूप में किया जाता है। अध्ययन से स्पष्ट होता है कि खाद्य मुद्रास्फीति का प्रभाव केवल भोजन की लागत तक सीमित नहीं रहता, बल्कि परिवारों के गैर-खाद्य उपभोग को भी प्रभावित करता है। घरेलू उपभोग व्यय सर्वेक्षण 2022-23 के अनुसार ग्रामीण भारत में औसत मासिक प्रति व्यक्ति उपभोग व्यय ₹3,773 तथा शहरी भारत में ₹ 6,459 था। ग्रामीण क्षेत्र में खाद्य का हिस्सा कुल औसत मासिक प्रति व्यक्ति उपभोग व्यय का लगभग 46 प्रतिशत और शहरी क्षेत्र में 39 प्रतिशत था। घरेलू उपभोग व्यय सर्वेक्षण 2023-24 में खाद्य का हिस्सा ग्रामीण भारत में 47.04 प्रतिशत और शहरी भारत में 39.68 प्रतिशत दर्ज हुआ। इससे स्पष्ट है कि खाद्य कीमतों में वृद्धि ग्रामीण परिवारों की वास्तविक क्रय-शक्ति पर विशेष रूप से गंभीर प्रभाव डालती है। शोध में पाया गया कि 2020-21 में खाद्य मुद्रास्फीति कोविड-19 और आपूर्ति व्यवधानों के कारण ऊँची रही, 2021-22 में अपेक्षाकृत नरमी दिखाई दी, जबकि 2022-23 में वैश्विक खाद्य एवं ऊर्जा संकट तथा घरेलू आपूर्ति दबावों ने पुनः मुद्रास्फीति को बढ़ाया। 2023-24 और 2024 में सब्जियों, दालों, मसालों, अंडों तथा अन्य खाद्य पदार्थों की कीमतों में तीव्र उतार-चढ़ाव ने खाद्य मुद्रास्फीति को अत्यधिक अस्थिर बनाया। आरबीआई के अनुसार 2023-24 में समग्र मुद्रास्फीति में नरमी आई, लेकिन खाद्य मुद्रास्फीति आवर्ती आपूर्ति झटकों के कारण अस्थिर रही और चरम मौसम घटनाओं ने मूल्य-वृद्धि को बढ़ाया। अध्ययन का निष्कर्ष है कि भारत में खाद्य मुद्रास्फीति का समाधान केवल मौद्रिक नीति के माध्यम से संभव नहीं है। कृषि उत्पादकता, भंडारण, शीत-श्रृंखला, बाजार सुधार, आपूर्ति शृंखला दक्षता, खाद्य प्रसंस्करण, लक्षित सामाजिक सुरक्षा, पोषण कार्यक्रम, जलवायु-स्मार्ट कृषि तथा प्रभावी मूल्य सूचना प्रणाली को समन्वित रूप से मजबूत करना आवश्यक है।
प्रमुख शब्द- महँगाई, खाद्य मुद्रास्फीति, घरेलू उपभोग, वास्तविक आय, ग्रामीण अर्थव्यवस्था, शहरी अर्थव्यवस्था, खाद्य सुरक्षा, भारत।

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Published

31-07-2025

How to Cite

1.
डा0 मनोज कुमार अवस्थी. भारत में महँगाई और घरेलू उपभोगः खाद्य मुद्रास्फीति के आर्थिक प्रभाव का विश्लेषण: DOI- https://doi.org/10.5281/zenodo.22996545. IJARMS [Internet]. 2025 Jul. 31 [cited 2026 Oct. 5];8(02):224-39. Available from: https://journal.ijarms.org/index.php/ijarms/article/view/949

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