परिवार संस्था का बदलता स्वरूप- संयुक्त से एकल परिवार की ओर
Abstract
परिवार संस्था मानव समाज की सबसे महत्वपूर्ण एवं आधारभूत इकाई है, जो व्यक्ति के सामाजिक, सांस्कृतिक और नैतिक विकास में केंद्रीय भूमिका निभाती है। भारतीय समाज में पारंपरिक रूप से संयुक्त परिवार प्रणाली का प्रभुत्व रहा है, जिसमें कई पीढ़ियाँ एक साथ निवास करती थीं तथा संसाधनों, दायित्वों और संबंधों का सामूहिक निर्वहन होता था। किन्तु आधुनिक युग में तीव्र सामाजिक-आर्थिक परिवर्तनों जैसे नगरीकरण, औद्योगिकीकरण, शिक्षा का प्रसार, वैश्वीकरण तथा महिला सशक्तिकरण ने परिवार संस्था के स्वरूप में व्यापक बदलाव उत्पन्न किए हैं। शोध-पत्र संयुक्त परिवार से एकल परिवार की ओर हो रहे संक्रमण का समाजशास्त्रीय विश्लेषण प्रस्तुत करता है। अध्ययन में यह पाया गया कि यह परिवर्तन केवल संरचनात्मक नहीं, बल्कि कार्यात्मक, सांस्कृतिक एवं मनोवैज्ञानिक स्तर पर भी परिलक्षित होता है। एकल परिवारों के बढ़ते प्रचलन ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता, गोपनीयता तथा निर्णय-क्षमता को बढ़ावा दिया है, जबकि दूसरी ओर सामाजिक सुरक्षा, पारिवारिक सहयोग और वृद्धों की देखभाल जैसी पारंपरिक विशेषताओं में कमी आई है। शोध यह भी इंगित करता है कि संयुक्त परिवार पूर्णतः समाप्त नहीं हुआ है, बल्कि उसने परिवर्तित रूप जैसे संशोधित संयुक्त परिवार, में स्वयं को अनुकूलित कर लिया है, जहाँ सदस्य भौगोलिक रूप से अलग रहते हुए भी भावनात्मक एवं आर्थिक रूप से जुड़े रहते हैं। अतः निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि परिवार संस्था का बदलता स्वरूप आधुनिकता और परंपरा के बीच संतुलन स्थापित करने की प्रक्रिया है, जो भारतीय समाज में निरंतर विकसित हो रही है।
मुख्य शब्द - परिवार संस्था, संयुक्त परिवार, एकल परिवार, नगरीकरण, आधुनिकीकरण, सामाजिक परिवर्तन, महिला सशक्तिकरण, वैश्वीकरण
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