भारत में महिला सशक्तिकरण- राजनीतिक परिप्रेक्ष्य
Abstract
भारत में महिला सशक्तिकरण एक बहुआयामी अवधारणा है, जिसका राजनीतिक परिप्रेक्ष्य अत्यंत महत्वपूर्ण है। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात भारतीय संविधान ने महिलाओं को समानता, स्वतंत्रता और राजनीतिक अधिकार प्रदान किए, किंतु व्यावहारिक स्तर पर उनकी राजनीतिक भागीदारी लंबे समय तक सीमित रही। समय के साथ विभिन्न नीतिगत पहलों, आरक्षण व्यवस्थाओं तथा सामाजिक जागरूकता अभियानों के माध्यम से महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी में वृद्धि हुई है। पंचायती राज संस्थाओं में 33 प्रतिशत (और कई राज्यों में 50 प्रतिशत) आरक्षण ने स्थानीय स्तर पर महिला नेतृत्व को सुदृढ़ किया है, जिससे निर्णय-निर्माण प्रक्रियाओं में उनकी सक्रिय भूमिका सुनिश्चित हुई है। हालांकि, संसद और विधानसभाओं में महिलाओं का प्रतिनिधित्व अभी भी अपेक्षाकृत कम है, जो लैंगिक असमानता की निरंतरता को दर्शाता है। पितृसत्तात्मक संरचना, शिक्षा का अभाव, आर्थिक निर्भरता तथा राजनीतिक दलों में अवसरों की कमी जैसी चुनौतियाँ महिला सशक्तिकरण के मार्ग में बाधक हैं। इसके बावजूद, समकालीन भारत में महिलाओं की राजनीतिक चेतना, नेतृत्व क्षमता और सहभागिता में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। यह अध्ययन इस बात पर बल देता है कि प्रभावी नीतियों, शिक्षा, और सामाजिक परिवर्तन के माध्यम से महिलाओं के राजनीतिक सशक्तिकरण को और अधिक सुदृढ़ किया जा सकता है, जिससे लोकतंत्र अधिक समावेशी और सुदृढ़ बनेगा।
कुंजी शब्द - महिला सशक्तिकरण, राजनीतिक भागीदारी, लैंगिक समानता, पंचायती राज, आरक्षण नीति, महिला नेतृत्व, लोकतंत्र, सामाजिक परिवर्तन
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